2029 तक भी नहीं टिकेगी मोदी सरकार…”: गुरदीप सिंह सप्पल का बड़ा दावा, बोले- जातिगत जनगणना को फेल करने की हो रही है साजिश

शिमला। एआईसीसी के स्थायी सदस्य और कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष के सलाहकार गुरदीप सिंह सप्पल ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान देश में होने वाली आगामी जातिगत जनगणना, बेरोजगारी और मौजूदा राजनीतिक-आर्थिक हालातों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखे हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस पार्टी के दबाव और जनता की मांग के कारण सरकार को मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ रहा है, लेकिन केंद्र की नीयत साफ नहीं है और वह इस प्रक्रिया को ‘प्लान टू फेल’ यानी असफल करने की साजिश रच रही है।

गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अतीत में जातिगत जनगणना के खिलाफ बयान देते रहे हैं। वर्ष 2011 के सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) का डेटा सरकार के पास आने के बावजूद उसे दबा दिया गया। सरकार का यह तर्क कि स्पेलिंग की गलतियों के कारण 48 लाख जातियां सामने आ गईं, केवल एक बहाना था। इसके लिए बनाई गई अरविंद पनगढ़िया कमेटी की न कभी बैठक बुलाई गई और न ही सदस्य नियुक्त किए गए। उन्होंने मांग की कि तेलंगाना, बिहार और कर्नाटक की तर्ज पर फॉर्म में जातियों के नाम पहले से मुद्रित (printed) होने चाहिए ताकि केवल सिर गिनने के बजाय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक आधार का पूरा डेटा सामने आ सके, जिससे हर वर्ग की वास्तविक प्रगति के लिए योजनाएं बनाई जा सकें।
सप्पल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण को जारी रखने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ (एम्पिरिकल डेटा) अनिवार्य कर दिया गया है। यदि सरकार सही डेटा इकट्ठा नहीं करेगी, तो राज्यों में आरक्षण और छात्र कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों पर कानूनी संकट खड़ा हो जाएगा।

सरकार के भविष्य पर बात करते हुए सप्पल ने दावा किया कि राहुल गांधी के अनुसार नरेंद्र मोदी की सरकार 2029 तक भी नहीं टिकेगी। उन्होंने कहा कि सरकार अब तक केवल चार स्तंभों—बड़े व्यक्तित्व, जनता में फैलाए गए डर, बड़े-बड़े सपनों और मीडिया के प्रोपेगैंडा—पर टिकी थी, जो अब कमजोर पड़ चुके हैं। मैन्युफैक्चरिंग का जीडीपी में हिस्सा 17% से घटकर 11.5% रह गया है, और देश में बुनियादी ढांचे के टूटने से विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं।
शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर सरकार को घेरते हुए सप्पल ने आंकड़े रखे कि आईआईटी से पढ़ाई करने के बाद भी देश में 44 प्रतिशत युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है। उच्च शिक्षण संस्थानों (जैसे एम्स, आईआईटी, आईआईएम) में एससी (75%), एसटी (84%), ओबीसी (85%) और ईडब्ल्यूएस (72%) के प्रोफेसरों के पद भारी संख्या में खाली पड़े हैं। उन्होंने कहा कि प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में बीए की फीस 6-7 लाख रुपये, डीयू के नए कोर्सेज की फीस 8 लाख रुपये, एमबीए की फीस 20 से 50 लाख रुपये और मेडिकल की प्राइवेट फीस 1 से 4 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। भारी-भरकम फीस चुकाने के बाद भी 60 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं या जोमैटो जैसी डिलीवरी नौकरियां करने को मजबूर हैं। यदि यही हाल रहा, तो आने वाले समय में गरीब परिवार बच्चों को पढ़ाना पूरी तरह बंद कर देंगे।