सार्वजनिक धन के एक-एक रुपये का हिसाब होना चाहिए और उसका उपयोग उसके वांछित उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए: लोकसभा अध्यक्ष

नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों (पीएसी) से सार्वजनिक धन के संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने बल देकर कहा कि सरकारी खजाने से निकाले गए हर एक रुपये का उचित हिसाब होना चाहिए और जिस उद्देश्य के लिए उसे आवंटित किया गया था उसी के लिए उसका पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और उत्तरदायित्व लोकतंत्र की आधारशिला हैं और सार्वजनिक व्यय का असली पैमाना यह होना चाहिए कि इससे आम नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है।

बिरला ने तिरुवनंतपुरम में संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि पीएसी संसदीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण संस्था है। इस पर सार्वजनिक व्यय की जांच करने, वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने और कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का उत्तरदायित्व होता है। उन्होंने कहा कि इन समितियों का काम केवल खातों की जांच या लेखा परीक्षा की रिपोर्ट देखने तक सीमित नहीं है; उन्हें यह भी देखना चाहिए कि क्या निर्धारित किए गए उद्देश्य सार्वजनिक धन से पूरे हुए हैं और क्या वे परिणाम मिले हैं जिनके लिए यह धन आवंटित किया गया था।

बिरला ने लेखा परीक्षा की आपत्तियों के 10, 15 या 20 वर्षों तक अनसुलझे रहने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक मामलों का लंबित रहना पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने ठोस, व्यवस्थित और समयबद्ध कार्य योजना बनाने का आह्वान किया ताकि लेखा परीक्षा संबंधी आपत्तियों और उन पर की जाने वाली कार्रवाई को बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरा किया जा सके। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर निगरानी, ​​समीक्षा और समय-समय पर इसके संबंध में अनुवर्ती कार्रवाई की व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए ताकि उत्तरदायित्व केवल कागजों तक सीमित न रहे बल्कि समय रहते सुधारात्मक कदम भी उठाए जाएं। श्री बिरला ने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के रूप में विपक्ष के किसी सदस्य को नियुक्त करने की अनूठी लोकतांत्रिक परंपरा का जिक्र करते हुए, कहा कि यह प्रथा भारत के संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता, समावेशिता और मजबूती को दर्शाती है। समिति में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक व्यय की जांच के दौरान अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकें। उन्होंने इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक संस्थाओं की उस क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया जो एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठ सकती हैं।