नई दिल्ली। अप्रैल 2025 में भारत के प्रधानमंत्री की श्रीलंका यात्रा के दौरान व्यक्त किए गए दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, भारत श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी के माध्यम से आध्यात्मिक पहुंच और सांस्कृतिक कूटनीति की एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहे है।
वर्तमान में वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित ये पवित्र अवशेष, 4 से 10 फरवरी 2026 तक सार्वजनिक दर्शन के लिए कोलंबो ले जाए जाएंगे, और 11 फरवरी 2026 को उनकी वापसी निर्धारित है।

यह पवित्र यात्रा बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूप में भारत के स्थायी सभ्यतागत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है और भारत तथा श्रीलंका के बीच गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और जन-जन के संबंधों की पुष्टि करती है।
इन पवित्र अवशेषों के साथ गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री श्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल जाएगा, जिसमें वरिष्ठ भिक्षु और अधिकारी भी शामिल होंगे।
निर्धारित प्रोटोकॉल और अवशेषों को दी जाने वाली पवित्रता के अनुरूप, वे भारतीय वायु सेना के एक विशेष विमान से पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ यात्रा करेंगे। यह उस श्रद्धा को दर्शाता है जिसके साथ भारत अपनी पवित्र विरासत को संजोए हुए है।
यह प्रतिनिधिमंडल कोलंबो में औपचारिक, धार्मिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लेगा। इनमें प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन और भारत की बौद्ध विरासत एवं समकालीन सांस्कृतिक जुड़ाव को उजागर करने वाली अन्य संबंधित प्रदर्शनियाँ शामिल होंगी।
पवित्र अवशेषों को कोलंबो के प्रतिष्ठित गंगारामया मंदिर में सार्वजनिक दर्शन के लिए स्थापित किया जाएगा, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बौद्ध संस्थानों में से एक है। उन्नीसवीं सदी के अंत में श्रद्धेय हिक्कादुवे श्री सुमंगला नायक थेरा द्वारा स्थापित यह मंदिर पूजा, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जो इस प्रदर्शनी के लिए एक उपयुक्त और गरिमामय वातावरण प्रदान करता है।
एक ऐसा राष्ट्र जहाँ बौद्ध धर्म वहाँ के सांस्कृतिक लोकाचार, इतिहास और दैनिक जीवन को आकार देता है, वहां इस प्रदर्शनी के श्रीलंका के श्रद्धालुओं के बीच गहराई से गूंजने और दोनों देशों की साझा बौद्ध विरासत को और अधिक सुदृढ़ करने की उम्मीद है।
देवनिमोरि अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के निकट स्थित देवनिमोरि पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए हैं, जो अत्यधिक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का स्थान है। पहली बार 1957 में प्रख्यात पुरातत्वविद् प्रो. एस. एन. चौधरी द्वारा इस स्थल की खोज की गई थी।
उत्खनन (खुदाई) के दौरान यहाँ महत्वपूर्ण बौद्ध संरचनाएं और अवशेष मिले, जो साझा युग की शुरुआती शताब्दियों में पश्चिमी भारत में बौद्ध धर्म के फलने-फूलने के जीवंत प्रमाण हैं। ये अवशेष न केवल एक अमूल्य पुरातात्विक खजाना हैं, बल्कि भगवान बुद्ध की शाश्वत शिक्षाओं—शांति, करुणा और सद्भाव—के जीवंत प्रतीक भी हैं।