नई दिल्ली। तृतीय अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन–2026 का उद्घाटन सत्र इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जनपथ, नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वैश्विक हिन्दी परिवार, और दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषाओं और साहित्यिक अध्ययन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। इस सम्मेलन का उद्घाटन भारत के माननीय उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने किया।

इस अवसर पर पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष और प्रख्यात विद्वान, पद्म भूषण राम बहादुर राय ने की। श्याम परांडे, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव, और प्रसिद्ध जापानी भाषाविद् पद्म टोमियो मिसोकामी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। डॉ. सचिदानंद जोशी, सदस्य सचिव, आईजीएनसीए, और प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी, विभागाध्यक्ष, भारतीय भाषा और साहित्यिक अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, भी इस अवसर पर मौजूद थे। सत्र का संचालन अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन के निदेशक अनिल जोशी ने किया।

तृतीय अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन में बोलते हुए उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भाषाएँ सभ्यता की जीवंत चेतना हैं, क्योंकि वे सिर्फ संचार का साधन नहीं हैं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, परंपरा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाले मूल्यों की वाहक भी हैं। भारत की एकता कभी समानता पर आधारित नहीं रही; बल्कि यह कई भाषाओं के आपसी सम्मान से बनी है, जो साझा सभ्यतात्मक दृष्टि और धर्म द्वारा एक-दूसरे से बंधी हुई हैं। भारतीय भाषाएँ विरोधाभासी नहीं हैं; बल्कि ये लगातार एक-दूसरे में योगदान देती हैं, जिससे दर्शन, ज्ञान और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति समृद्ध होती है।

प्राचीन शिलालेखों और ताड़पत्र की पांडुलिपियों से लेकर आज के डिजिटल रूपों तक, भाषाओं ने सोच को आकार दिया है, ज्ञान को सहेजा है और सामूहिक कल्पना को पल्लवित-पोषित किया है। चूंकि भाषाएँ हमेशा सीमाओं से परे यात्रा करती रही हैं, यहाँ तक कि कूटनीति से भी बहुत पहले, इसलिए आज हमारा कर्तव्य सिर्फ भाषाई विविधता की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि लुप्तप्राय भाषाओं को समर्थन देना और उन्हें शिक्षा व तकनीक के माध्यम से आत्मविश्वासके साथ भविष्य में ले जाना भी है। इस तरह, हरेक भाषा का जश्न मनाते हुए हम हर भारतीय की गरिमा को बनाए रखते हैं, क्योंकि भारत एक है और हमेशा एक रहेगा।