
शिमला। कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने आज यहां डॉ. गीतांजलि थापर द्वारा लिखित पुस्तक “Deciphering Legal Language: A Practical Handbook for Law Students” का विमोचन किया। यह पुस्तक विधिक भाषा की जटिलताओं पर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य नवोदित अधिवक्ताओं को विधिक भाषा का अधिक परिष्कृत एवं स्थायी रूप से प्रयोग करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना है।
भाषा, विधि की जीवनरेखा है। न्यायिक निर्णय और विधिक अभिमत शब्दों की सटीकता, स्पष्टता तथा उनकी सार्थकता पर आधारित होते हैं। विधिक भाषा (Legalese) संप्रेषण का एक विशिष्ट माध्यम है तथा एक तकनीकी उपकरण भी है, जिसकी अपनी परंपराएं, शब्दावली और तर्क-पद्धतियां होती हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘Deciphering Legal Language: A Practical Handbook for Law Students’ विधिक भाषा की प्रकृति, कार्य, शब्दकोश, संरचना एवं वाक्य-विन्यास का विश्लेषण करती है, जो विधिक विमर्श को उसका विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं।
विधेयकों, न्यायिक निर्णयों तथा विधिक मसौदा-प्रक्रियाओं के उदाहरणों के माध्यम से यह पुस्तक विधिक भाषा को समझने का प्रयास करती है तथा यह दर्शाती है कि शब्द किस प्रकार अधिवक्ताओं के उपकरण के रूप में विधि और न्याय के निर्धारण एवं व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विधि विद्यार्थियों के लिए एक मार्गदर्शिका के रूप में यह पुस्तक विधिक भाषा की बारीकियों पर व्यावहारिक जानकारी प्रदान करती है और पाठकों तथा नवोदित अधिवक्ताओं को विधिक भाषा का अधिक परिष्कृत एवं प्रभावी उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है।
पुस्तक का विमोचन करते हुए कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने डॉ. गीतांजलि के प्रयासों की सराहना की और कहा कि विधि समुदाय के लिए न्यायालयीन कार्यवाहियों में विधिक शब्दावली के उपयोग हेतु इस प्रकार की प्रामाणिक पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक विधि के विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगी, जो भविष्य में न्याय-प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
इस अवसर पर विधि संकाय से प्रो. संजय सिंधु भी उपस्थित रहे, जिन्होंने इस पुस्तक की भूमिका (Foreword) लिखी है तथा अपनी शुभकामनाएं प्रदान कीं।