उपराष्ट्रपति ने गोवा स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान का दौरा किया

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज गोवा के पणजी स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईओ) का दौरा किया।

उपराष्ट्रपति ने संस्थान में वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि लगभग 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा वाले भारत के लिए महासागर केवल एक संसाधन नहीं बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है जिसका सम्मान और संरक्षण करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत के समुद्र देश को विश्व से अलग करने वाली सीमाएं नहीं हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और रणनीतिक शक्ति से जोड़ने वाले सेतु हैं।

उपराष्ट्रपति ने भारत की समुद्री विरासत का उल्‍लेख करते हुए कहा कि सदियों से हिंद महासागर ने भारत की सभ्यता को आकार दिया है, जहां प्राचीन भारतीय व्यापारियों, विद्वानों और नाविकों ने समुद्र के पार सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए हैं।

राधाकृष्‍णन ने सीएसआईआर-एनआईओ के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संस्थान लगभग छह दशकों से भारत के प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों में से एक रहा है। उन्होंने कहा कि अपने शोध, नवाचार और अन्वेषण के माध्यम से यह संस्थान भारत को अधिक आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार बनाने में मदद कर रहा है।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करने के लिए सरकार के प्रयासों की भी सराहना की। सीएसआईआर और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह साझेदारी अनुसंधान, नवाचार, प्रौद्योगिकी विकास और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देगी। उन्होंने कहा कि भारतीय अनुसंधान संस्थानों को वैश्विक स्तर पर उन्नत प्रणालियों से निरंतर सीखना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप चलना चाहिए।

राधाकृष्‍णन ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते समुद्री जल स्तर, समुद्री प्रदूषण, जैव विविधता हानि और सूक्ष्म प्लास्टिक जैसी बढ़ती चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया भर के तटीय समुदाय तेजी से असुरक्षित होते जा रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं हो सकता और समुद्र विज्ञान अब केवल वैज्ञानिक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य की रक्षा और एक स्थायी, सुरक्षित और समृद्ध विश्व के निर्माण के लिए आवश्यक हो गया है। उन्होंने जिम्मेदार नवाचार के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि वैज्ञानिक प्रगति हमेशा करुणा, स्थिरता और जिम्मेदारी से निर्देशित होनी चाहिए।

राधाकृष्‍णन ने भारत की भविष्योन्मुखी पहलों का उल्‍लेख करते हुए कहा कि डीप ओशन मिशन, ब्लू इकोनॉमी पहल, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और नवीकरणीय ऊर्जा साझेदारी जैसे कार्यक्रम भविष्य के बारे में साहसिक सोच रखने वाले राष्ट्र को दर्शाते हैं।

उपराष्ट्रपति ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की वैज्ञानिक प्रगति ने न केवल अपने नागरिकों बल्कि कई विकासशील देशों की भी मदद की है, जो “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि जहां कई देश पेटेंट हासिल करने में लगे थे, वहीं भारत ने मानवता की सेवा को चुना था। उन्‍होंने कहा कि यदि भारत मजबूत होता है, तो मानवता अधिक सुरक्षित हाथों में होगी।

राधाकृष्‍णन ने युवा शोधकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए, उनसे निडर होकर सपने देखने और अथक परिश्रम करने का आग्रह किया। गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का उल्‍लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सच्ची उत्कृष्टता अक्सर किसी विषय में गहरी व्यक्तिगत रुचि और समर्पण से उत्पन्न होती है। उपराष्‍ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि संस्थानों और वरिष्ठ मार्गदर्शकों को ऐसी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित और पोषित करना चाहिए।

उन्‍होंने विश्वास व्यक्त किया कि जलवायु समाधान, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा या महासागर संरक्षण के क्षेत्र में अगली बड़ी उपलब्धि संस्थान में उपस्थित युवा प्रतिभाओं से ही निकल सकती है। उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि इनमें से कोई एक दिन भारत के भविष्य के अभियानों का नेतृत्व करते हुए दुनिया के सबसे गहरे महासागरों तक पहुंचेगा।

राधाकृष्‍णन ने अपनी यात्रा के दौरान, विभिन्न प्रयोगशालाओं और अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी का दौरा किया, जिसमें संस्थान की प्रमुख परियोजनाओं और वैज्ञानिक पहलों को प्रदर्शित किया गया था। उन्होंने “समुद्र विज्ञान उत्कृष्टता की एक हीरा विरासत” नामक एक कॉफी टेबल बुक का विमोचन भी किया।


इस अवसर पर गोवा के राज्यपाल पुसापति अशोक गजपति राजू, सीएसआईआर-एनआईओ के निदेशक प्रोफेसर सुनील कुमार सिंह और अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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