नई दिल्ली। आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी में त्वचा सम्बंधी विकारों के प्रबंधन के लिए मानक उपचार दिशानिर्देश (एसटीजी) जारी किए हैं। इनमें योग को भी शामिल किया गया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के आयुष विभाग द्वारा तैयार किए गए इस दस्तावेज़ का उद्देश्य आयुष प्रणालियों में नैदानिक देखभाल में अधिक एकरूपता, गुणवत्ता आश्वासन और साक्ष्य-आधारित उपचार लाना है।
आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्री प्रतापराव जाधव ने उल्लेख किया कि ये दिशानिर्देश आयुष प्रणालियों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ढांचे के साथ और अधिक एकीकृत करने में सहायक होंगे। उन्होंने ने कहा, “ये दिशानिर्देश सामान्य त्वचा रोगों के लिए सुरक्षित, प्रभावी और समग्र देखभाल को बढ़ावा देने हेतु प्रणाली-विशिष्ट नैदानिक दृष्टिकोणों को समकालीन वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ते हैं। मानकीकृत और साक्ष्य-आधारित नैदानिक अभ्यास को बढ़ावा देकर, ये दिशानिर्देश रोगी देखभाल में सुधार लाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में आयुष प्रणालियों की भूमिका को मजबूत करने में योगदान देंगे।”
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि ये दिशानिर्देश आयुष प्रणालियों में मानकीकरण और साक्ष्य-आधारित नैदानिक उपचार को बढ़ावा देने में सहायक होंगे। उन्होंने कहा, “त्वचा सम्बंधी विकारों के लिए मानक उपचार दिशानिर्देश आयुष प्रणालियों में मानकीकरण, गुणवत्ता और साक्ष्य-आधारित अभ्यास को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विशेषज्ञों के परामर्श और समकालीन वैज्ञानिक साक्ष्यों के मूल्यांकन के माध्यम से विकसित ये दिशानिर्देश प्रत्येक आयुष प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों को संरक्षित करते हुए रोकथाम, निदान, उपचार और अनुवर्ती कार्रवाई के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रदान करते हैं। ये नैदानिक उपचार में अधिक एकरूपता को बढ़ावा देंगे और रोगी देखभाल में तर्कसंगत निर्णय लेने में सहायता करेंगे।”
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. लवनीश जी. कृष्णा ने त्वचा सम्बंधी देखभाल में सुधार के लिए बहुविषयक सहयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, “त्वचा सम्बंधी विकारों के लिए मानक उपचार दिशानिर्देश आयुष प्रणालियों में गुणवत्ता आश्वासन, एकरूपता और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा वितरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बहुविषयक सहयोग को बढ़ावा देकर, ये दिशानिर्देश आयुष चिकित्सकों को सुरक्षित, प्रभावी और रोगी-केंद्रित देखभाल प्रदान करने में सहायता करेंगे।”