शिमला : हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने मंडी से सांसद कंगना रनौत द्वारा ‘दिशा’ बैठक में अधिकारियों के प्रति अपनाए गए रवैये पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि मंडी संसदीय क्षेत्र से सांसद कंगना रनौत द्वारा बैठक में अपना आपा खोकर अधिकारियों को लताड़ना एक सांसद के पद की मर्यादा के विपरीत है। चौहान ने स्पष्ट किया कि इस खीझ के पीछे उनका अपना राजनीतिक अनुभवहीन होना और संसद निधि (MPLAD) के ₹11 करोड़ खर्च न कर पाने की हताशा है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि को समीक्षा का पूरा अधिकार है, लेकिन पब्लिसिटी स्टंट के लिए अधिकारियों से दुर्व्यवहार करने के बजाय उपायुक्त की उपस्थिति में योजना-वार शालीनता से चर्चा की जानी चाहिए थी। उनके इस व्यवहार से पूरे प्रदेश की छवि धूमिल हो रही है और मंडी की जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
वहीं उन्होंने नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और पूर्व सरकार के कामकाज पर निशाना साधते हुए नरेश चौहान ने कहा कि विपक्ष का काम केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि सकारात्मक सुझाव देना भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व जयराम सरकार ने एसजेवीएनएल और अन्य नेशनल हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े समझौतों (MoUs) में राज्य के हितों को पूरी तरह दरकिनार किया तथा इंडस्ट्रियल एरिया के नाम पर हजारों बीघा जमीन औने-पौने दामों में लुटा दी। इसके विपरीत वर्तमान मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही केंद्र, पड़ोसी राज्यों, बीबीएमबी, शानन प्रोजेक्ट,कशाऊ बांध और फाइव स्टार होटलों से जुड़े प्रदेश के हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी है। उन्होंने दावा किया कि आने वाले 2027 के चुनावों में यह मुख्य मुद्दा बनेगा कि किस सरकार ने प्रदेश के हितों की रक्षा की और किसने उन्हें बेचा, जिसका फैसला हिमाचल की जागरूक जनता करेगी।
इसके साथ ही कैग रिपोर्ट और देश में चुनावी चंदे से जुड़े मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते हुए नरेश चौहान ने कहा कि वित्तीय स्थिति को लेकर कैग रिपोर्ट में कोई नई बात नहीं है और वर्तमान समस्याएं पिछली सरकारों के खराब वित्तीय प्रबंधन का नतीजा हैं, जिन पर वर्तमान सरकार गंभीरता से आवश्यक कदम उठाएगी। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर चंदे के खेल पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ का PM का दावा अब खोखला साबित हो चुका है। गुजरात में बिना जनआधार वाली अज्ञात पार्टियों को ₹200 से ₹600 करोड़ का चंदा मिलने, 2014 से पहले ₹24 करोड़ की संपत्ति वाली भाजपा के पास आज ₹10,000 करोड़ से अधिक की संपत्ति होने और टाटा ग्रुप द्वारा ₹700 करोड़ के चंदे के बदले ₹40,000 करोड़ की सब्सिडी मिलने जैसे तथ्य अत्यंत गंभीर हैं। उन्होंने मांग की कि केंद्रीय एजेंसियों के दम पर मामलों को दबाने के बजाय संसद या सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से इस पूरे नेक्सस की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।