शिमला। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र पटियाला एवं भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश तथा गेयटी ड्रामेटिक सोसाइटी शिमला के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हिम संगीत उत्सव -2026 की पंचम व अंतिम सांझ में गुलज़ार हुसैन व मोहम्मद उमर की वायलिन वादन व दिलरुबा वादन की युगल प्रस्तुति तथा संतोष नायर ग्रुप द्वारा समकालीन गायन व नृत्य ने समा बांधा।
गुलज़ार हुसैन
वायलिन वादक गुलज़ार हुसैन मूलतः राजस्थान के जयपुर से सम्बन्ध रखते है।का जन्म राजस्थान के गुलाबी नगर कहलाये जाने वाले शहर जयपुर के एक इन्होंने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा विनोद शर्मा, उस्ताद बन्ने खाँ व राजस्थान के वरिष्ठ वायलिन वादक श्री राजीव जी अग्रवाल से प्राप्त हुई। गुरूजनों ने गुलज़ार की प्रतिभा व संगीत के अभ्यास को देखकर वायलिन के जादूगर पं. वी.जी. जोग के पास वायलिन वादन की बारीकियाँ व संगीत की शिक्षा प्राप्त की। साथ ही तबला नवाज़ उस्ताद निसार हुसैन खाँ से भी मार्गदर्शन मिला। ये आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनुमोदित कलाकार है ।कठिन परिश्रम से संगीत जगत में इन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। जो युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक हैं। इन्होंने उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र पटियाला के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों व अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपने एकल व जुगलबन्दी के अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं। साउथ अफ्रिका, मोरिशियस, ओमान, सउदीअरब, यु.ए.ई.) में भी अपनी कला का जादू बिखेरा है
मोहमद उमर , दिलरुबा वादक
देश के उन चुनिंदा कलाकारों में से एक है जिन्होंने विलुप्त हो रहे दिलरुबा वाद्य यंत्र को एक नया स्वरूप देकर इसकी मधुर संगीत को जीवित रखा है इस वाद्य यन्त्र को मयूर वीणा भी कहा जाता है। राम जी हर्षय ,उस्ताद गुलज़ार हुसैन के के सान्निध्य में इन्होंने इस संगीत की शिक्षा प्राप्त की है।
दिलरुबा वाद्य यन्त्र का सिंध प्रांत से भक्ति संगीत में आया है जो आज भी गुरुद्वारे में आज भी प्रयुक्त सबद और गुरुबाणी गायन को संगीत देता है।
संतोष नायर
संतोष नायर तीन दशकों से पारंपरिक और समकालीन, दोनों तरह के नृत्य रूपों की पारंगत व सक्रिय कलाकार है।समकालीन नृत्य प्रस्तुति ‘रहस्यमयी जंगल’ जंगल के भीतर जीवन की लय और अनुभवों को दर्शाता है। ये समकालीन नृत्य की खास शख्ससियत है। इन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर प्रस्तुतियों, कोरियोग्राफी के कार्यों ने उन्हें इस क्षेत्र में अपनी एक खास जगह बनाने में मदद की है।
साध्या’ की समकालीन नृत्य प्रस्तुति ‘रहस्यमयी जंगल’ जंगल के भीतर जीवन की लय और अनुभवों को दिखाती है जो पारंपरिक ‘मयूरभंज छऊ’ की दमदार नृत्य-शैली से प्रेरित होकर, इसकी कोरियोग्राफी उस शैली की मज़बूत और ज़मीन से जुड़ी मुद्राओं को एक समकालीन दृष्टि से प्रस्तुत करते है जो नृत्य के माध्यम से जंगल में रहने वालों की गतिविधियों, भावनाओं, रीति-रिवाजों और आपसी रिश्तों को दर्शाती है; यह एक ऐसी दुनिया पेश करती है जो प्रकृति और उसकी स्वाभाविक लय से गहराई से जुड़ी हुई है। संगीत, कोरियोग्राफी, रोशनी और वेशभूषा—ये सभी मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो जंगल के जीवन की सादगी और तालमेल को दिखाता है।
इसके साथ ही, यह प्रस्तुति बड़े ही कोमल ढंग से एक विचार भी सामने रखती है—इस प्राकृतिक दुनिया को शांति और बिना किसी रुकावट के बने रहने देने पर केंद्रित है।
इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक लॉ एंड ऑर्डर अभिषेक एस., उपनिदेशक0भाषा एवं संस्कृति विभाग बिहारी लाल शर्मा,सहायक निदेशक एनजेडसीसी रवींद्र शर्मा,सहायक निदेशक अभिलेखागार मोहन ठाकुर,कार्यक्रम संयोजक व सहायक निदेशक निष्पादन व ललित कला अनिल हारटा, जिला भाषा अधिकारी सरोजना नरवाल,सांस्कृतिक आयोजक जसविंदर सिंह, कार्यवाहक प्रबंधक गेयटी दलीप शर्मा ,डॉ संजय, कुमार, रोहित नाग सांस्कृतिक आयोजक जसविंदर सिंह, बलवेन्द्र ठाकुर,शिवम ठाकुर, नीरज शर्मा सहित सैंकड़ों संगीत प्रेमी पर्यटक उपस्थित रहे।